किसानों के कंधे पर रखी जा रही देशद्रोही बंदूकें!

 

सुरभि भावसार 

क्या किसान आंदोलन में देशद्रोहियों और जिहादियों की घुसपैठ हो गई है? क्या किसान आंदोलन में सच में खालिस्तानी मूवमेंट है? क्या किसानों को हिंसा के लिए उकसाया जा रहा है? क्या किसान आंदोलन के बीच देश में माहौल खराब करने की साजिश रची जा रही है? क्या देश के अन्नदाता को बदनाम करने की कोशिश की जा रही है? ये सवाल इसलिए क्योकि हाल ही में जो ख़बरें मीडिया में चल रही है, वो इन सब की ओर इशारा कर रही है। जो किसान नए कृषि कानूनों को वापस लेने की मांग के लिए आंदोलन कर रहे हैं, वे अचानक देशद्रोह के आरोपियों की रिहाई की मांग क्यों करने लगे? 

दरअसल, गुरूवार को मानवाधिकार दिवस के मौके पर दिल्ली की टिकरी बॉर्डर पर धरना दे रहे किसानों के मंच पर देशद्रोह के आरोप में जेल में बंद आरोपियों के फोटो वाला पोस्स्टर नजर आया। इतना ही नहीं इन पोस्टर्स में इन्हें क्रांति का नायक बताते हुए रिहा करने की मांग की गई थी। इसे देखकर कहा जा रहा है कि किसान आंदोलन में देशद्रोहियों की घुसपैठ हो गई है। 

किसान आंदोलन में खालिस्तानी मूवमेंट की बात खुद महाराष्ट्र साइबर सेल ने कही है। साइबर सेल ने पिछले 16 दिनों में 12,800 पोस्ट ऐसे पाए हैं जिनमें खालिस्तान का ज़िक्र है, जबकि 6,321 पोस्ट ऐसे हैं जिनमे आतंकी जनरैल सिंग भिंडरावाले का ज़िक्र किया गया है। ये ज्यादातर अकाउंट्स ब्रिटेन, अमेरिका, कनाडा और भारत से चलाए जा रहे हैं और इनके जरिए झूठ फैलाया जा रहा है। जिस तरह से किसान आंदोलन को लेकर ब्रिटेन का बयान आया है, जिस तरह से वहां आंदोलन चल रहे है, इसे देखते हुए ये सवाल उठना लाज़मी है कि क्या इसके पीछे विदेशी ताकतें है? 

अब देखा जाए तो किसानों के खिलाफ कुछ भी बोलना हमारे देश में गुनाह हो जाता है। लेकिन जब किसान आंदोलन में देशद्रोहियों के आरोपियों के बैनर लगाए जाए, देश को नुकसान पहुंचाने की बात कही जाए, जब देश में आग लगाने की तांक में बैठे तत्वों की तादाद और मुखौटे इतने सारे हो, तो सोचना पड़ेगा कि किसानों के कंधे पर बंदूक किसंकी है? सरकार लगातार किसानों से बातचीत कर रही है और बिल में संशोधन के लिए भी तैयार है लेकिन किसान कुछ भी मानने को तैयार नहीं है। किसानों के दो मुख्य मुद्दे हैं। पहला मंडियां समाप्त न हो जाएं और दूसरा न्यूनतम समर्थन मूल्य बरकरार रहे। इन दोनों ही मसलों पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद कह चुके हैं कि ऐसा नहीं होने जा रहा और न ही कृषि कानूनों में कहीं इसका उल्लेख है। इस सबके बावजूद बातचीत में कोई खास रुचि इस कथित किसान आंदोलन के नेतृत्व की लगती नहीं है।


किसान सरकार की किसी भी बात को मानने के लिए तैयार नहीं है। इनका रवैया अचानक बदल गया और उन्होंने सरकार से बातचीत से इनकार करते हुए आंदोलन बड़ा करने का ऐलान कर दिया। किसानों की रूचि अब सरकार से बात करने में नहीं बल्कि दिल्ली को घेरने में और इनके बीच बैठे राष्ट्र विरोधी तत्वों के एजेंडे को चलाने में लग रही है। सरकार हर उकसाने की कोशिश पर संयम बरत रही है लेकिन पूरी आशंका है कि ये राष्ट्र विरोधी तत्व इस आंदोलन को हिंसक मुकाम पर ले जाना चाहते हैं।

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