शूरवीरों की शौर्यगाथा के 50 साल

 



साल 1971 में दिसंबर वो महीना था, जब दुनिया का नक्शा बदल गया था, हिंदुस्तान को बांटने चला पाकिस्तान खुद टुकड़े-टुकड़े हो गया था, भारत के शूरवीरों ने वो विजयघोष किया था, जिसे आज देश 'विजय दिवस' के रूप में मना रहा है। ये किस्सा है बहादुरी का, किस्सा है विकासशील देश की कूटनीति का, किस्सा है उस फौज का जिसके पास बड़ी मात्रा में हथियार भले ही ना थे लेकिन हौंसले चट्टान की तरह मजबूत थे, किस्सा है पाकिस्तान के आताम्समार्पण के अभूतपूर्व पैमाने का। तीन दिसंबर, 1971 को जब पाकिस्तान ने भारत पर हमला कर युद्ध छेड़ दिया था, तब हिंदुस्तान के शूरवीरों ने उसे उसकी जगह दिखा दी थी और बता दिया था कि, भारत को छेड़ोगे तो चूर-चूर हो जाओगे। आज इस शौर्य के 50 साल पूरे हो गए है।
 
दरअसल, तीन दिसंबर, 1971 को पाकिस्तान ने भारतीय वायुसेना के 11 स्टेशनों पर हमला कर युद्ध शुरू किया था, लेकिन हमारे शूरवीरों ने 13 दिनों में ही उसे घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया था। पाकिस्तान के 93 हजार सैनिक भारत के एक मेजर जनरल के पैरों के जूते चाटने पर मजबूर हो गए थे। उस समय पाकिस्तान न केवल अपने सैनिकों को छुड़ाने के लिए भारत के सामने गिड़गिड़ाया था, बल्कि उसे इसकी कीमत बांग्लादेश के तौर पर चुकानी पड़ी थी। दुश्मनों की मौत का प्रण लिए, दिमाग में ठोस रणनीति लिए, दिल में देशभक्ति का जज्बा लिए और हाथों में हथियार लिए दुश्मनों को मिट्टी में मिलाने के लिए निकले हिंदुस्तान के रणबांकुरों ने 16 दिसंबर 1971 को बांग्लादेश के ढाका में जो किया, वो आज एक सुनहरा इतिहास है।

पाकिस्तान ने साथ 13 दिन तक चले इस युद्ध में भारत की विजय तब हुई, जब  बदन पर सेना की वर्दी... लाइन से खड़े हट्टे-कट्टे खड़े नौजवान... कंधे पर हथियार टांगे ये 93 हज़ार नौजवान भारतीय सेना के सामने सिर झुकाए-हाथ बांधे खड़े थे और सामने सीना गर्व से चौड़ा कर, चेहरे पर विजयी मुस्कान लिए कुर्सी पर बैठे थे मेजर जनरल जंगजीत सिंह अरोड़ा। युद्ध के दौरान भारतीय सेना ने पाकिस्‍तान के लगभग 15,010 किमी के क्षेत्र को अपने कब्‍जे में ले लिया। हालांकि, शिमला समझौते में ये क्षेत्र पाकिस्‍तान को वापस कर दिए गए। इस सघन युद्ध में 3,900 भारतीय सैनिकों ने शहादत दी थी।

 


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