जनादेश...
लोकतंत्र में ताकतवर नेता नहीं, जनता होती है और यह बात हाल ही में हुए लोकसभा चुनाव में सभी ने देख भी ली है। जिस जनता ने एक मुख्यमंत्री को अपना भरपूर समर्थन देकर ना सिर्फ प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठाया बल्कि सबसे चमकते तारे के रूप में फलक तक पहुंचाया। 10 साल बाद ऐसा क्या हुआ कि इसी जनता ने एक झटके में आपकी चमक फीकी कर दी। क्या आप जनता के विश्वास पर खरे नहीं उतर पाए? क्या जिन वादों से प्रभावित होकर जनता ने आपको सत्ता की चाबी सौंपी थी उन्हें पूरा करने में कोई कमी रह गई या आप जनता को मूर्ख समझकर खुद को सर्वश्रेष्ठ मानने लगे थे? वजह जो भी हो लेकिन सबक बहुत बड़ा है। बेशक आप हारे नहीं है, दिल्ली के सिंहासन पर आप ही विराजमान होंगे लेकिन उसके चारों पैर अलग–अलग होंगे। आपको उनके बीच संतुलन बनाकर चलना होगा। 2014 के लोकसभा चुनाव में जनता ने अपना पूर्ण समर्थन देकर आपको अपना राजा चुना। पहली बार लोकतंत्र के मंदिर में प्रवेश करने से पहले आपका दंडवत होना और फिर संविधान को नमन करने ने यह साफ कर दिया था कि आप जनसेवा के लिए समर्पित है। प्रधानसेवक के रूप में आपका जनता और देश के प्रति समर्पण दिखा भी। ...