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Showing posts from 2019

अब 'निर्भया' नहीं निर्भय बनना होगा, आश्वासन नहीं कानून बनाना होगा

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सुरभि भावसार  फिर एक बेटी हैवानियत का शिकार हुई और उसे जला कर मार दिया गया। फिर लोग मोमबत्ती लेकर सड़क पर उतर गए, सोशल मीडिया पर RIPPriyanka, JusticeForPriyanka चलने लगा लेकिन ये सब आखिर कब तक? कब तक देश की बेटियों के साथ ऐसी दरिंदगी होती रहेगी और समाज कुछ दिन सड़क पर आक्रोश जताकर फिर चुप बैठ जाएगा। आखिर कब तक सरकार और प्रशासन कार्रवाई का भरोसा देता रहेगा? हैदराबाद की पशु चिकित्सक डॉ प्रियंका रेड्डी को चार दरिंदों ने अपनी हवस का शिकार बनाया और फिर उसे जलाकर मार डाला। अखबारों में ऐसी हैवानियत की खबर की स्याही सूखती नहीं कि उससे पहले एक और खबर आ जाती है। आज हमारे देश में इन दरिंदों के हौंसले इतने बढ़ गए है कि दो साल की मासूम भी सुरक्षित नहीं है। हमारे देश में ऐसे दरिंदों को सख्त सजा देने की बजाय ऐसे अपराधों को सांप्रदायिक रंग देकर उसकी तीव्रता को कम करने की कोशिश की जाती है। अफ़सोस कि हमारे देश में ऐसे अपराधों के खिलाफ कानून और सख्त से सख्त सजा का प्रावधान लाने की जगह इस पर राजनीति शुरू हो जाती है, चैनलों पर बहस होने लगती है। जनता पूछ रही हैं 'बेटी बचाओं बेटी पढ़ाओ...

सपना साकार या सत्ता से प्यार!

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सुरभि भावसार राजनीति सिर्फ जनता की सेवा के लिए नहीं, यहां सत्ता भी सबको चाहिए होती है। तमाम उठा-पटक और सियासी घमासान के बीच उद्धव ठाकरे के सिर पर मुख्यमंत्री का ताज सज गया है। उद्धव ठाकरे ने भले ही अपने पिता बालासाहेब का सपना पूरा कर दिया है लेकिन सत्ता के लिए उन्हें अपने पिता की ही विचारधारा से समझौता करना पड़ा है। सत्ता ने शिवसेना को अपने मूल सिद्धांतों से दूर कर दिया।  वो कहते है ना कि राजनीति जो कराए वो कम है। इसका सटीक उदाहरण महाराष्ट्र में देखने को मिला है। सत्ता के लिए शिवसेना ने अपने 30 साल पुराने साथी भाजपा का साथ छोड़कर अपने से उलट विचारधारा वाली एनसीपी और कांग्रेस से हाथ मिला लिया। ये साफ़ है कि शिवसेना हमेशा से ही कट्टर हिंदुत्व की छवि को लेकर आगे बढ़ी है। अयोध्या में राम मंदिर निर्माण को लेकर आंदोलन में भी शिवसेना ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। उद्धव ठाकरे के उलट विचारधारा वाली पार्टियों के साथ मिलकर सरकार बनाना कई सवालों को जन्म दे रहा है। सवाल उठ रहे है कि उद्धव ठाकरे का सीएम बनना बालासाहेब का सपना पूरा करना है या फिर सत्ता से प्यार है? क्या शिवसेना ने सत्ता ...

ये कैसी सौदेबाज़ी!

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सुरभि भावसार हाल ही में हुए लोकसभा चुनाव में मोदी लहर के सामने तमाम बड़ी राष्ट्रीय पार्टियों सहित क्षेत्रीय पार्टियों का सफया हो गया और बीजेपी अपने महाजनादेश के साथ एक बार फिर सत्ता पर काबिज हो गई। लोकसभा चुनाव में भाजपा भले ही राष्ट्रवाद के दम पर केंद्र की कुर्सी पर विराजमान हुई है, लेकिन हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव ने सियासी तस्वीर बदल कर रख दी है। इनमें बीजेपी को क्षेत्रीय दलों के सामने झुकने पर मजबूर होना पड़ा है। वर्तमान राजनीति में क्षेत्रीय दलों का प्रभाव बढ़ने लगा है। यही कारण है कि क्षेत्रीय दल राजनीति को व्यापारिक सौदे में बदलने की सीनाजोरी कर रहे हैं क्योकि उसका पूरा खेल सत्ता की कुर्सी पर काबिज होने का रहता है।  read more:  चंद्रयान-2: डिगे नहीं है, अडिग है हम, लौटकर फिर आएंगे कड़वा जरुर है लेकिन ये सच है। आज की राजनीति में खुले तौर पर भाव-ताव हो रहे है। राजनीति में सौदेबाजी की शुरुआत उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा के उदय के बाद हुई थी। ऐसी राजनीति की शुरुआत बेशक क्षेत्रीय दलों के बढ़ते प्रभाव के कारण हुई है लेकिन राष्ट्रीय दल भी इससे...

चंद्रयान-2: डिगे नहीं है, अडिग है हम, लौटकर फिर आएंगे

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सुरभि भावसार  जीरो का आविष्कार हो या चांद पर जाने का सपना, भारत ने हमेशा ही अपने कारनामों से दुनिया को चौंकाया है। इस बार भले ही चांद पर पहुंचने में कामयाब नहीं हुए, लेकिन हौसले बुलंदी पर है। हालांकि चंद्रयान-2 के चांद से चंद कदम दूर तक पहुंचने के बाद संपर्क टूट गया था। इससे वैज्ञानिक निराश हो गए थे, मगर वह एक बार फिर पूरे जोश के साथ उठ खड़े हुए हैं। मिशन भले ही सफल नहीं हो पाया हो, पर हर भारतीय को वैज्ञानिकों की सालों की मेहनत पर गर्व है और इस सफलता पर वैज्ञानिकों को सेल्यूट किया है।  ऐसा नहीं है कि चंद्रयान-2 का विक्रम लैंडर क्षतिग्रस्त हो गया है, उसका ऑर्बिटर अब भी पूरी शान से चांद के चक्कर लगा रहा है, जो लगभग सालभर तक शोध करेगा, साथ ही हर छोटी-छोटी जानकारी धरती पर भेजेगा। यह भी किसी सफलता से कम नहीं है, दुनिया के अन्य देशों के मिशन तो चांद के चक्कर लगाने से पहले ही धराशायी हो गए थे, लेकिन भारतीय वैज्ञानिकों ने चांद तक पहुंचने में सफलता हासिल की है। उपलब्धि की बात करें तो भारत से पहले अमेरिका, रूस और चीन चांद तक पहुंचे चुके हैं, मगर हम इस बार रह गए हैं, किं...