सपना साकार या सत्ता से प्यार!
सुरभि भावसार
राजनीति सिर्फ जनता की सेवा के लिए नहीं, यहां सत्ता भी सबको चाहिए होती है। तमाम उठा-पटक और सियासी घमासान के बीच उद्धव ठाकरे के सिर पर मुख्यमंत्री का ताज सज गया है। उद्धव ठाकरे ने भले ही अपने पिता बालासाहेब का सपना पूरा कर दिया है लेकिन सत्ता के लिए उन्हें अपने पिता की ही विचारधारा से समझौता करना पड़ा है। सत्ता ने शिवसेना को अपने मूल सिद्धांतों से दूर कर दिया।
वो कहते है ना कि राजनीति जो कराए वो कम है। इसका सटीक उदाहरण महाराष्ट्र में देखने को मिला है। सत्ता के लिए शिवसेना ने अपने 30 साल पुराने साथी भाजपा का साथ छोड़कर अपने से उलट विचारधारा वाली एनसीपी और कांग्रेस से हाथ मिला लिया। ये साफ़ है कि शिवसेना हमेशा से ही कट्टर हिंदुत्व की छवि को लेकर आगे बढ़ी है। अयोध्या में राम मंदिर निर्माण को लेकर आंदोलन में भी शिवसेना ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।
उद्धव ठाकरे के उलट विचारधारा वाली पार्टियों के साथ मिलकर सरकार बनाना कई सवालों को जन्म दे रहा है। सवाल उठ रहे है कि उद्धव ठाकरे का सीएम बनना बालासाहेब का सपना पूरा करना है या फिर सत्ता से प्यार है? क्या शिवसेना ने सत्ता के लिए हिंदुत्व की राजनीति से समझौता कर लिया? कुछ तो यहां तक कह रहे है कि उद्धव ठाकरे का मुख्यमंत्री बनना पिता का सपना साकार करना कम और सत्ता के लिए प्यार ज्यादा लग रहा है।
बालासाहेब का सपना पूरा करने वाले उद्धव ठाकरे ये कैसे भूल सकते है कि उनके पिता ने कभी हिंदुत्व से समझौता नहीं किया था। पिछले चार दशकों से जो शिवसेना कट्टर हिंदुत्व की छवि और सिद्धांतों को लेकर राजनीति में शिखर तक पहुंची, वहीं सत्ता के लिए अपने मूल सिद्धांतों के साथ समझौता कर बैठी है।
शिवसेना का ये बदला रूप उन कार्यकर्ताओं को नहीं सुहा रहा जो सड़कों पर हिंदुत्व की राजनीति करते थे क्योकि अब उस आम कार्यकर्ता को कांग्रेस और एनसीपी गठबंधन वाली सरकार के चलते कॉमन मिनिमम प्रोग्राम के अनुसार राजनीति करने के लिए विवश होना पड़ेगा।
उद्धव ठाकरे की जिद के आगे भले ही शिवसैनिक दबे मन से कांग्रेस और एनसीपी के साथ गठबंधन वाली सरकार को स्वीकार कर रहे हो लेकिन ये चुप्पी कब तक बनी रहेगी ये तो समय ही बताएगा। कहा जा रहा है कि सीएम की कुर्सी भले ही उद्धव ठाकरे को मिली है लेकिन सत्ता की असली चाबी एनसीपी प्रमुख शरद पंवार के हाथों में है। ऐसे में राजनीतिक पंडित उद्धव ठाकरे सरकार को दूर का सफर तय करते नहीं देख रहे हैं।

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