ये कैसी सौदेबाज़ी!



सुरभि भावसार

हाल ही में हुए लोकसभा चुनाव में मोदी लहर के सामने तमाम बड़ी राष्ट्रीय पार्टियों सहित क्षेत्रीय पार्टियों का सफया हो गया और बीजेपी अपने महाजनादेश के साथ एक बार फिर सत्ता पर काबिज हो गई। लोकसभा चुनाव में भाजपा भले ही राष्ट्रवाद के दम पर केंद्र की कुर्सी पर विराजमान हुई है, लेकिन हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव ने सियासी तस्वीर बदल कर रख दी है। इनमें बीजेपी को क्षेत्रीय दलों के सामने झुकने पर मजबूर होना पड़ा है।

वर्तमान राजनीति में क्षेत्रीय दलों का प्रभाव बढ़ने लगा है। यही कारण है कि क्षेत्रीय दल राजनीति को व्यापारिक सौदे में बदलने की सीनाजोरी कर रहे हैं क्योकि उसका पूरा खेल सत्ता की कुर्सी पर काबिज होने का रहता है। 


कड़वा जरुर है लेकिन ये सच है। आज की राजनीति में खुले तौर पर भाव-ताव हो रहे है। राजनीति में सौदेबाजी की शुरुआत उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा के उदय के बाद हुई थी। ऐसी राजनीति की शुरुआत बेशक क्षेत्रीय दलों के बढ़ते प्रभाव के कारण हुई है लेकिन राष्ट्रीय दल भी इससे अछूते नहीं रहे है। सौदेबाज़ी की ये राजनीति कर्नाटक में कांग्रेस-जेडीएस की सरकार में भी देखने को मिली थी। 

हालांकि शिवसेना भले ही मुख्यमंत्री पद के लिए 50-50 के फ़ॉर्मूले पर अड़ी हो लेकिन पार्टी की बैठक में अपने युवा नेता आदित्य ठाकरे को पीछे रखकर वरिष्ठ नेता एकनाथ शिन्दे को विधायक दल का नेता बनाकर शिवसेना ने संकेत दिया है कि वह अपनी शर्तों में ढील छोड़ने के लिए तैयार है। खैर जो भी है लेकिन महाराष्ट्र में भाजपा-शिवसेना सरकार का ही गठन होना है क्योकि इसके अलवा कोई और दूसरा विकल्प ही नहीं है। 





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