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शिक्षण संस्थानों को संघर्ष का मैदान न बनाएं छात्र नेता

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सुरभि भावसार  छात्र राजनीति का मूल उद्देश्य विद्यार्थियों के अधिकारों की रक्षा करना, उनके समस्याओं का समाधान करना और शैक्षणिक संस्थाओं में सुधार के लिए आवाज उठाना है। यह एक ऐसा मंच है, जहां युवा नेतृत्व कौशल विकसित करते हैं, लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं का अभ्यास करते हैं और यहीं से भविष्य के नेता निकलते हैं । लेकिन पिछले कुछ सालों से ये संगठन गुंडागर्दी, हिंसा और अनुशासनहीनता के अड्डे बनते जा रहे हैं। अब यह राजनीति सत्ता प्रदर्शन और व्यक्तिगत स्वार्थों का साधन बन चुकी है।   वर्तमान में कई छात्र संगठन राजनीतिक दलों से जुड़े हुए हैं और उनके इशारे पर काम करते हैं। शिक्षण संस्थानों में हड़तालें, प्रशासनिक भवनों पर कब्जा, शिक्षकों के साथ दुर्व्यवहार और शैक्षणिक गतिविधियों को बाधित करना आम हो गया है। छात्र नेताओं का रवैया अब अधिकारों की मांग करने के बजाय दबंगई दिखाने तक सीमित रह गया है। इसका ताजा उदाहरण होलकर साइंस कॉलेज में हाल ही में हुई प्राचार्या और 150 से ज्यादा प्रोफेसरों को बंधक बनाने की घटना है। होली उत्सव में मनमानी करने की अनुमति नहीं मिलने मात्र से कुछ विद्यार्थियों...

ट्रेंड बदला : जॉब से पहले स्किल्स परख रहीं कंपनियां, 35 प्रतिशत तक बढ़े इंटर्नशिप के मौके

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- आइटी से लेकर मार्केटिंग और डिजाइन जैसे क्षेत्रों में ज्यादा डिमांड - इधर, 21 से 30 साल के युवाओं को ‘शॉर्टकट’ से चाहिए कामयाबी सुरभि भावसार इंदौर. सिर्फ डिग्री हासिल करना अब अच्छी नौकरी की गारंटी नहीं है। बदलते जॉब मार्केट में कंपनियां सीधे भर्ती के बजाय इंटर्नशिप के जरिए युवाओं की स्किल्स परख रही हैं। खासकर जनरेशन जेड यानी 21 से 30 साल के युवा, जो कॅरियर में जल्दी बदलाव चाहते हैं, उनकी कार्यशैली को समझने के लिए कंपनियां यह तरीका अपना रही हैं। आइटी से लेकर मार्केटिंग और डिजाइन जैसे क्षेत्रों में यह ट्रेंड बढ़ रहा है। इंदौर भी इससे अछूता नहीं है। शहर में बीते दो साल में आइटी कंपनियों और स्टार्टअप्स में इंटर्नशिप के अवसरों में 35 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। 80 फीसदी इंटर्न्स को मिल रही स्थायी नौकरी शहर की आइटी कंपनियों और स्टार्टअप्स के आंकड़ों के अनुसार, करीब 80 फीसदी स्टूडेंट्स को इंटर्नशिप के बाद स्थायी नौकरी मिल रही है। खास बात यह है कि कंपनियां 3 से 6 महीने तक की इंटर्नशिप ऑफर कर रही हैं, जिसमें युवाओं को एम्प्लॉई जैसी जिम्मेदारियां दी जाती हैं। इस दौरान उनकी स्किल्स, व्यवहा...

जनादेश...

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  लोकतंत्र में ताकतवर नेता नहीं, जनता होती है और यह बात हाल ही में हुए लोकसभा चुनाव में सभी ने देख भी ली है। जिस जनता ने एक मुख्यमंत्री को अपना भरपूर समर्थन देकर ना सिर्फ प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठाया बल्कि सबसे चमकते तारे के रूप में फलक तक पहुंचाया। 10 साल बाद ऐसा क्या हुआ कि इसी जनता ने एक झटके में आपकी चमक फीकी कर दी। क्या आप जनता के विश्वास पर खरे नहीं उतर पाए? क्या जिन वादों से प्रभावित होकर जनता ने आपको सत्ता की चाबी सौंपी थी उन्हें पूरा करने में कोई कमी रह गई या आप जनता को मूर्ख समझकर खुद को सर्वश्रेष्ठ मानने लगे थे? वजह जो भी हो लेकिन सबक बहुत बड़ा है। बेशक आप हारे नहीं है, दिल्ली के सिंहासन पर आप ही विराजमान होंगे लेकिन उसके चारों पैर अलग–अलग होंगे। आपको उनके बीच संतुलन बनाकर चलना होगा। 2014 के लोकसभा चुनाव में जनता ने अपना पूर्ण समर्थन देकर आपको अपना राजा चुना। पहली बार लोकतंत्र के मंदिर में प्रवेश करने से पहले आपका दंडवत होना और फिर संविधान को नमन करने ने यह साफ कर दिया था कि आप जनसेवा के लिए समर्पित है। प्रधानसेवक के रूप में आपका जनता और देश के प्रति समर्पण दिखा भी। ...