ब्रांड नहीं किसान जरुरी
सुरभि भावसार गांवों से दूर भागने और गांव के लोगों से सामाजिक दूरी बनाने वाले वही लोग आज गांवों की तरफ भाग रहे है। लॉकडाउन के समय जब सबकुछ बंद है तो लोगों को सामान आसानी से नहीं मिल पा रहा है और कही मिल भी रहा है तो बहुत महंगे दामों में। ऐसे में कई बार देखने में आया कि सुबह-सुबह लोग सब्जियों के लिए गांवों की ओर दौड़ रहे है। मॉल से हर चीज और ब्रांड वाली चीजें खरीदने वाले लोग भी आज किसानों से सब्जियां खरीद रहे है। जब ये नजारा देखों तो लगता है कि हम ब्रांड के बिना रह सकते है लेकिन किसान के बिना नहीं। वैसे भी जब अब प्रधानमंत्री ने लोकल के लिए वोकल बनने की बात कही है तो इसकी आदत डालनी भी होगी। हमें अब लोकल चीजों को ही अपनाकर उसे ब्रांड बनाना होगा। वैसे भी इस लॉकडाउन ने इतना तो सीखा ही दिया है कि मुसीबत के समय लोकल ही काम आता है। हर चीज मॉल से खरीदने वाले लोग भी आज सब्जियों के लिए गांवों में भटक रहे हैं। गांव की चीजों से दूर भागने वाले ही आज उन्ही के पीछे भाग रहे है। बड़े-बड़े मॉल तक पहुंच रखने वाले लोग आज अपने घरों में कैद है। जिन लोगों को हर छोटी से छोटी चीज ब्रांड वाली चाहिए होती है, वे लोग...