चला गया 'सपनों का सौदागर'
खुद को सपनों का सौदागर कहने वाले, छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री अजित जोगी ने दुनिया को अलविदा कह दिया है। पिछले काफी समय से तबीयत ख़राब होने के चलते वे अस्पताल में भर्ती थे और आज रायपुर के देवेन्द्र नगर स्थित नारायणा अस्पताल में उन्होंने दोपहर 3:30 बजे अंतिम सांस ली। उन्होंने इंदौर कलेक्टर से लेकर मुख्यमंत्री पद तक का सफ़र तय किया और यह साबित कर दिया कि एक सफल प्रशासनिक अधिकारी किस तरह से सफल राजनेता भी बन सकता है।
29 अप्रैल 1946 को बिलासपुर के पेंड्रा रोड के जोगीडोंगरी में जन्में अजित जोगी बचपन में तेंदूपत्ता बीनकर, नंगे पैर स्कूल जाकर, किताबों के अभाव में पढ़कर आईएस बने। उन्होंने 1960 में भोपाल के मौलाना आज़ाद कॉलेज ऑफ टेक्नोलॉजी से मेकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई शुरू की और 1968 में IPS बने। अजीत डोभाल, तेलांगना के गवर्नर ई एस एल नरसिम्हन उनके बैचमेट थे।
अपने करियर की शुरुआत बतौर कलेक्टर करने वाले जोगी जब इंदौर में कलेक्टरी कर रहे थें, तब वे तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के संपर्क में आए और 1986 में उन्होंने राजनीति में कदम रखा। इसके बाद उनका राजनीतिक सिक्का चमकता गया और दो बार राज्यसभा सदस्य, दो बार लोकसभा सदस्य, एक बार मुख्यमंत्री रहने के अलावा उनके खाते में कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता रहने का रिकॉर्ड भी दर्ज है।
साल 2000 में छत्तीसगढ़ का गठन होते ही राज्य के पहले मुख्यमंत्री बनने का गौरव उन्हें प्राप्त हुआ। मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते हुए जोगी का वो बयान इतिहास के पन्नों में उन अमिट पंक्तियों की तरह दर्ज हो गया, जिसे हर राजनीतिक विश्लेषक बार-बार दोहराता है। उन्होंने खुद को 'सपनो का सौदागर' कहा था। उन्होंने कहा था कि- 'हाँ मैं सपनों का सौदागर हूँ। मैं सपने बेचता हूँ।' 2003 में हुए विधानसभा चुनावों में उन्हें हार का सामना करना पड़ा।
11 अप्रैल 2004 को मैनपुर में उनका एक्सीडेंट हुआ, तब से ही वे व्हील चेयर पर थे। इस एक्सीडेंट के बाद उनका राजनीतिक ग्राफ गिरता गया। 2008 और 2013 में भी 'सपनों का सौदागर' अपने सपने नहीं बेच पाया। इसके बाद 2018 विधानसभा चुनावों के ठीक पहले उन्होंने कांग्रेस से अपनी राह अलग करते हुए ‘जोगी जनता कांग्रेस ‘ के नाम से नई पार्टी बना ली। नई पार्टी बनाकर 5 विधायक जितवाकर उन्होंने ये साबित किया कि मध्य भारत में भी तीसरी पार्टी उभर सकती है।
हालांकि उनका नई पार्टी बनाने का हुकुम का इक्का कमाल नहीं कर पाया और कांग्रेस की लहर के आगे सब धराशाई हो गए। कांग्रेस से दो-दो हाथ करने के लिए उन्होंने बसपा के साथ गठबंधन किया लेकिन सपने के सौदागर का सपना, सपना ही रह गया।

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