अब 'निर्भया' नहीं निर्भय बनना होगा, आश्वासन नहीं कानून बनाना होगा



सुरभि भावसार 

फिर एक बेटी हैवानियत का शिकार हुई और उसे जला कर मार दिया गया। फिर लोग मोमबत्ती लेकर सड़क पर उतर गए, सोशल मीडिया पर RIPPriyanka, JusticeForPriyanka चलने लगा लेकिन ये सब आखिर कब तक? कब तक देश की बेटियों के साथ ऐसी दरिंदगी होती रहेगी और समाज कुछ दिन सड़क पर आक्रोश जताकर फिर चुप बैठ जाएगा। आखिर कब तक सरकार और प्रशासन कार्रवाई का भरोसा देता रहेगा?

हैदराबाद की पशु चिकित्सक डॉ प्रियंका रेड्डी को चार दरिंदों ने अपनी हवस का शिकार बनाया और फिर उसे जलाकर मार डाला। अखबारों में ऐसी हैवानियत की खबर की स्याही सूखती नहीं कि उससे पहले एक और खबर आ जाती है। आज हमारे देश में इन दरिंदों के हौंसले इतने बढ़ गए है कि दो साल की मासूम भी सुरक्षित नहीं है।

हमारे देश में ऐसे दरिंदों को सख्त सजा देने की बजाय ऐसे अपराधों को सांप्रदायिक रंग देकर उसकी तीव्रता को कम करने की कोशिश की जाती है। अफ़सोस कि हमारे देश में ऐसे अपराधों के खिलाफ कानून और सख्त से सख्त सजा का प्रावधान लाने की जगह इस पर राजनीति शुरू हो जाती है, चैनलों पर बहस होने लगती है।

जनता पूछ रही हैं 'बेटी बचाओं बेटी पढ़ाओं' का नारा देने वाले नेता ऐसे समय कहां रह जाते है? क्या ये नेता अपने राजनीतिक फायदे को साइड में रखकर बेटियों की रक्षा के लिए आगे नहीं आ सकते? राजनीति न करके यदि सभी दल सरकार से इसके खिलाफ कानून बनाने की मांग करे तो शायद कोई बेटी ऐसी हैवानियत का शिकार ना हो। ऐसे दरिंदों को सरेराह फांसी देने का क्रम शुरू होना चाहिए ताकि वह किसी लड़की को गलत नज़रों से देखने से पहले हजार बार सोचे।

यहां जितना दोष प्रशासन का है उतना ही दोष समाज, परिवार और परवरिश का भी है। आज भी समाज में लड़कियों पर तमाम पाबंदियां लगाई जाती है। उन्हें सलीके से रहना, धीरे बोलना, नज़रें झुकाकर चलना और अभिवादन करना सिखाया जाता है लेकिन ये नहीं कहा जाता है कि तुम अपनी आत्मरक्षा करना सीखों, चिल्लाना सीखो, पंच मारना और तेज बोलना सीखो ताकि कोई दरिंदा यदि तुम्हे गलत तरीके से छूने की कोशिश करें तो उसे उसके मुकाम तक पहुंचा सको।

डॉ प्रियंका रेड्डी को भी उनके माता-पिता ने खूब पढ़ाया और डॉक्टर बनाया लेकिन शायद ये नहीं कहा होगा कि तुम मन के साथ तन से भी मजबूत बनो ताकि जरुरत पड़ने पर आत्मरक्षा कर सको। पशुओं के साथ ऐसे जानवरों का इलाज करना भी सीखों जो बेटियों को बुरी नज़र से देखते हो।

खैर अब भी देर नहीं हुई है, आज समय बदल गया है। अपनी बेटियों को नैतिकता का पाठ पढ़ाने के साथ उन्हें मजबूत बनाने की भी जरुरत है। उनकी पढ़ाई में आत्मरक्षा की पढ़ाई भी शामिल हो ताकि वे हर स्थिति से निपट सके। उन्हें अहसास कराया जाए कि वह भी झांसी की रानी से कम नहीं है और समय आने पर वह हर परिस्थिति से लड़ सकती हैं।



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