हिंसा की ओर जाता बंगाल का 'रण'



सुरभि भावसार

पश्चिम बंगाल की राजनीति में भगवा रंग चढ़ने लगा तो वहां की राजनीति लाल रंग में रंगने लगी है। चुनावी हिंसा बंगाल में कोई नई बात नहीं है। 2019 लोकसभा चुनाव के समय भी बंगाल ने चुनावी हिंसा के नये कीर्तिमान गढ़े। हालात यह हुए कि देश के प्रधानमंत्री तक को वहां रैली या रोड शो करने में बाधा पहुंचाई गई। तत्कालीन भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के रोड शो पर भी हमला हुआ, जिसमें कई लोग घायल हुए थे। उस समय अपने वोट बैंक को सहेजने के चक्कर में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी सारी मर्यादाओं को लांघ गई। 

यही सब बंगाल में एक बार फिर देखने को मिल रहा है, क्योकि वहां कुछ महीनों में विधानसभा चुनाव होने है। बंगाल में चुनाव के दौरान जिस तरह का माहौल देखने को मिल रहा है, उससे साफ है कि लोकतंत्र की पारम्परिक लड़ाई में अभी भी काफी सुधार की जरूरत है। बंगाल फतह करने का मन बना चुकी भाजपा के लिए सत्ता की राह आसान नहीं दिख रही है। 

ममता के किले को ध्वस्त करने के लिए जब से भाजपा बंगाल में सक्रिय हुई है, भाजपा कार्यकर्ताओं पर लगातार हमले हो रहे है। कई कार्यकर्ताओं की हत्या कर दी गई है। हद तो तब हो गई , जब बंगाल में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी सुरक्षित नहीं रहे। दो दिन के बंगाल दौरे पर पहुंचे भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा के काफिले पर 24 परगना में पत्थरों से हमला किया गया। 

 जिस डायमंड हार्बर जाते समय ये हमला हुआ है, दरअसल वह ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी का संसदीय क्षेत्र है। वामपंथियों के किले को ध्वस्त कर बंगाल फतह करने वाली ममता बनर्जी भी उसी राह पर चल पड़ी हैं, जिसके विरोध को लेकर उन्होंने यह सियासी मुकाम हासिल किया था। भाजपा ने तो सीधेतौर पर इस हमले के लिए ममता सरकार और टीएमसी को जिम्मेदार बताया है, लेकिन टीएमसी का कहना है कि, भाजपा झूठ बोल रही है। 

 जेपी नड्डा के काफिले पर हुए हमले को सुरक्षा में चूक कहा जाए या ममता सरकार की साजिश। सवाल उठने लगे है कि, क्या ममता बनर्जी को सत्ता खोने का डर लग रहा है? इसलिए टीएमसी लगातार भाजपा कार्यकर्ताओं को निशाना बना रही है। क्या टीएमसी इस तरह के हमले कर भाजपा को डराना चाहती है? राज्य में हिंसा फैला कर उसका आरोप भाजपा पर लगाकर सहानुभूति बटोरना चाहतीं हैं। यदि ऐसा नहीं , तो सबसे बड़ा सवाल ये है कि, इतनी सुरक्षा के बीच भी काफिले पर हमला कैसे हुआ। 

हालांकि, भाजपा के आरोपों पर ममता बनर्जी का कहना है कि नाटक और हॉग मीडिया के जरिए बीजेपी लोगों को रैली तक नहीं ला सकी, क्या इसकी योजना बनाई गई? उन्होंने कैसे वीडियो तैयार किए. जबकि बीएसएफ और सीआरपीएफ के रहते कोई आपको कैसे छू सकता है?

बंगाल को हिंसा विरासत में मिली है। बंगाल में चुनाव के दौरान हो रही हिंसा का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि, वामपंथियों के 34 वर्ष के शासनकाल में करीब 28 हजार राजनीतिक हत्याएं दर्ज की गई। ऐसे में विधानसभा चुनाव आते देख राज्य में फिर हिंसा का दौर शुरू हो गया है। अब देखना ये होगा कि, इस विधानसभा चुनाव में भी हिंसा का भयानक मंजर ही देखने को मिलेगा या लोकतांत्रिक तरीकों में सुधार आएगा।

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