सिर्फ '15 मिनट' और विकास दुबे का गेम ओवर, सवाल के घेरे में एनकाउंटर
कानपुर में आठ पुलिसकर्मियों की हत्या का मुख्य आरोपी विकास दुबे शुक्रवार सुबह पुलिस एनकाउंटर में मारा गया। विकास दुबे तो मर गया लेकिन इस एनकाउंटर ने कई सवालों को जन्म दे दिया है। एनकाउंटर से पहले विकास दुबे की गाड़ी बदली जाती है और वह दुर्घटना का शिकार हो जाती है। एनकाउंटर से 10-15 मिनट पहले कानपुर की सीमा में दाखिल होते ही मीडिया को रोक दिया जाता है। इसके अलावा भी बहुत से सवाल है जो इस एनकाउंटर के बाद जन्म ले चुके है।
दरअसल, विकास दुबे की तलाश में पुलिस ने उसके साथियों के एनकाउंटर किए। 8 दिन के अंदर विकास दुबे के पांच गुर्गो के एनकाउंटर किए गए। गुरूवार को विकास दुबे के दो गुर्गे, प्रभात का कानपुर में और बऊआ दुबे का इटावा में एनकाउंटर हुआ। यहां प्रभात के एनकाउंटर के पहले पुलिस की गाड़ी पंचर होने की बात कही गई थी।
इससे एक दिन पहले बुधवार को जब विकास दुबे के दाहिने हाथ शॉर्प शूटर अमर दुबे को हमीरपुर में मारा गया। पुलिसकर्मियों की हत्या के एक दिन बाद ही विकास के मामा प्रेमप्रकाश पांडे और सहयोगी अतुल दुबे को बिकरू गांव के करीब मार दिया गया। इन सभी एनकाउंटर में एक ही बात निकलकर आ रही है कि ये सभी पुलिस पर हमला कर भागने की कोशिश कर रहे थे।
विकास दुबे के एनकाउंटर में भी यही बात सामने आई कि वह पुलिस की पिस्टल छिनकर भागने की कोशिश कर रहा था और इस दौरान उसका एनकाउंटर कर दिया गया, जिसमें उसकी मौत हो गई लेकिन इस एनकाउंटर के पीछे कई सवाल खड़े हो गए है।
बदली गई विकास दुबे की गाड़ी
उज्जैन से कानपुर ले जाते समय विकास दुबे की गाड़ी बदलना सबसे बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है। दरअसल, शुक्रवार को जब एसटीएफ विकास दुबे को उज्जैन से कानपुर ले जा रही थी तब उसे सफारी गाड़ी में बैठाया गया था लेकिन बीच में उसे महिन्द्रा की टीयूवी-100 में बैठा दिया गया, जो दुर्घटना का शिकार हो गई थी। जब पुलिस से गाड़ी बदलने की वजह पूछी गई तो उनका कहना था कि जब किसी बड़े अपराधी को एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जाता है तो उसे काफिले की गाड़ियों में बदल-बदलकर बैठाया जाता है, ताकि उसके गुर्गे हमला ना कर सके।
सीने पर ही क्यों चलाई गोली?
दूसरा सबसे बड़ा सवाल ये उठता है कि क्या पुलिस उसे जान से मार देना चाहती थी? एनकाउंटर के दौरान थ्योरी ये सामने आ रही है कि पुलिस ने विकास को भागने से रोकने के लिए गोली चलाई तो सीने पर ही क्यों? क्या पुलिस उसे मार देना चाहती थी? इस पर पुलिस का कहना है कि विकास ने पहले गोली चलाई थी। पुलिस ने जवाबी कार्रवाई की थी। यदि पुलिस गोली नहीं चलाती तो वो हमें मार देता।
एक्सीडेंट किसी ने नहीं देखा
तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण सवाल ये कि यदि पुलिस की गाड़ी दुर्घटनाग्रस्त हुई तो किसी ने एक्सीडेंट देखा क्यों नहीं? पलटने से पहले कुछ दूरी तक गाड़ी घिसटी लेकिन सड़क पर कोई निशान नहीं थे। तेज गति से गाड़ी पलटी तो ज्यादा नुकसान क्यों नहीं हुआ, सिर्फ शीशा ही क्यों टूटा? न्यूज़ एजेंसी एएनआई द्वारा जारी एक वीडियो में वहां मौजूद राहगीर का कहना है कि उन्होंने गोलियों की आवाज सुनी लेकिन पुलिस की कोई गाड़ी का एक्सीडेंट नहीं हुआ। वहीं पुलिस का कहना है कि गाड़ी पलटी थी।
मीडिया को रोका गया और उसी बीच विकास दुबे का गेम ओवर
चौथा सवाल ये कि मीडिया को टोल प्लाजा पर जबरन रोका गया और उसी बीच विकास दुबे का एनकाउंटर हो गया? दरअसल, जब एसटीएफ का काफिला उज्जैन से विकास दुबे को लेकर निकला तो मीडिया की गाड़ियां भी उसके पीछे थी। एसटीएफ ने बीच में कई बार मीडिया को रोकने की कोशिश की लेकिन मीडिया नहीं रुकी। इसी बीच एनकाउंटर से ठीक 15 मिनट पहले कानपुर में बैरिकेडिंग लगाकर मीडिया को रोक दिया गया। यहां से करीब 10-15 मिनट के बाद मीडिया आगे बढ़ी तो खबर मिलती है कि विकास दुबे मारा गया।
इसके अलावा भी कई सवाल है जिसके जवाब पुलिस को देंगे होगे-
- यदि उज्जैन के महाकाल मंदिर में विकास दुबे ने खुद सरेंडर किया तो कानपुर में एक्सीडेंट के बाद भागने की कोशिश क्यों की?
- विकास का एक पैर खराब था, तो वह पुलिस के हथियार छिनकर कैसे भाग सकता था।
- जब पहले भी विकास के गुर्गो ने पुलिस के हथियार छिनकर भागने की कोशिश की तो पुलिस ने विकास दुबे को ले जाते समय उसके हाथ क्यों नहीं बांधे।

Sahi h...
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