एक था गुलाम रसूल गलवान, जिसकी चतुराई से घाटी बनी 'गलवान घाटी'
भारत-चीन सीमा पर दोनों देशों के सैनिकों के बीच हुई हिंसक झड़प के बाद गलवानी घाटी का नाम काफी चर्चा में है। पूर्वी लद्दाख में स्थित गलवान घाटी वो जगह है जहां तप्ती गर्मी में भी तापमान शून्य से नीचे रहता है और नवंबर-दिसंबर में -20 डिग्री तक पहुंच जाता है। इस गला देने वाली ठंड में हमारे शूरवीर देश की रक्षा के लिए दुश्मन के सामने दीवार बनकर डटे रहते है। गलवान घाटी पर चीन हमेशा नजर गड़ाए रहता है क्योकि ये जगह अक्साई चीन में आती है। 1962 से लेकर 1975 तक भारत-चीन के बीच जितने भी संघर्ष हुए उनमें चीन गलवान घाटी पर ही अपना फोकस रखता आया है। अब 45 साल बाद 2020 में भारत-चीन सीमा पर खून बहा और गलवान घाटी फिर सुर्ख़ियों में आ गई। .
इसी बीच अब एक रोचक जानकारी हम आपको बता रहे है कि इस खूबसूरत घाटी का नाम गलवान घाटी कैसे पड़ा। .
लद्दाख में रहने वाले चरवाहे के नाम पर रखा घाटी का नाम .
गलवान घाटी का नाम लद्दाख के रहने वाले गुलाम रसूल गलवान के नाम पर रखा गया है। लेह के चंस्पा योरतुंग सर्कुलर रोड पर आज भी गुलाम रसूल के पूर्वजों का घर है। उनके नाम पर यहां गलवान गेस्ट हॉउस भी है। बताया जाता है कि उनकी चौथी पीढ़ी के कुछ सदस्य अभी भी यहां रहते हैं। नई जगहों को खोजने के जुनून में गलवान छोटी ही उम्र में घर से निकल गए और नई-नई जगह खोजने लगे। थोड़े बड़े होने पर वे उस इलाके में आने वाले यूरोपी यात्रियों के साथ गाइड के तौर पर जाने लगे। उन्होंने उस समय के कई मशहूर लोगों के साथ काम किया। 1925 में उनकी मौत हो गई लेकिन उससे पहले वह एक किताब लिख गए, जिसमें उन्होंने अपने सभी यात्रा वृत्तांतों को सहेज दिया था।
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पढ़े-लिखे नहीं होने के बावजूद लिखी किताब
गुलाम रसूल गलवान 1890 से लेकर 1896 तक मशहूर ब्रिटिश एक्सप्लोरर सर फ्रांसिस यंगहसबैंड के साथ रहे। यंगहसबैंड ही वह शख्स है जिन्होंने ब्रिटेन और तिब्बत के बीच 1904 का समझौता तैयार किया था। गलवान ने जिस 'सर्वेन्ट ऑफ़ साहिब्स' किताब में अपने यात्रा वृत्तांतों को सहेजा था, उसकी भूमिका सर फ्रांसिस यंगहसबैंड ने लिखी है। इस किताब की खासियत ये है कि ये गुलाम रसूल की टूटी-फूटी अंग्रेजी में उनके यात्रा वृत्तांतों को बताती है। गुलाम रसूल ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं थे लेकिन 35 साल की यात्राओं में उन्होंने अंग्रेजी, लद्दाखी, उर्दू, और तुर्की भाषाओं का इस्तेमाल सीख लिया था। गुलाम रसूल ने इस किताब के अध्याय 'द फाइट ऑफ चाइनीज' में बीसवीं सदी के ब्रिटिश भारत और चीनी साम्राज्य के बीच सीमा के बारे में भी लिखा है।
ऐसे पड़ा घाटी का नाम 'गलवान घाटी'
गुलाम रसूल गलवान के परिवार के रसूल बैले ने एक अखबार में लिखते हुए बताया था कि कैसे इस खूबसूरत घाटी को गलवान घाटी कहा जाने लगा। रसूल ने बताया कि जब 1892 में चार्ल्स मरे वहां आए, तो गलवान उनके साथ यात्रा पर निकले थे। उस समय गलवान की उम्र 14 साल थी। यात्रा के दौरान ऊंचे पहाड़ और खड़ी खाइयों के बीच उनका काफिला अटक गया। उनके बीच एक नदी भी बह रही थी। उस मुश्किल घड़ी में गलवान ने रास्ता खोज निकाला और काफिले को वहां से निकाल लिया। लद्दाखी इतिहासकार अब्दुल गनी शेख के मुताबिक़, गलवान की ये चतुराई देखकर चार्ल्स बहुत प्रभावित हुए और उस जगह का नाम गलवान नाला रख दिया और अब वही जगह ‘गलवान घाटी’ कहलाती है।

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