8 महीने पहले वैज्ञानिकों ने कहा था, संभल जाओ वरना... और फट गया ग्लेशियर

 



देहरादून: उत्तराखंड में रविवार को ग्लेशियर फटने से जो तबाही मची, इसकी चेतावनी वैज्ञानिकों ने 8 महीने पहले ही दे दी थी। उत्तराखंड के वैज्ञानिकों ने बताया था कि, उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर और हिमाचल के कई इलाकों में ऐसे ग्लेशियर हैं, जो कभी भी फट सकते हैं। इसको लेकर उन्होंने जम्मू-कश्मीर के काराकोरम रेंज में स्थित श्योक नदीं का उदाहरण दिया था।

देहरादून के वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ जियोलॉजी के वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी थी कि श्योक नदी के प्रवाह को एक ग्लेशियर ने रोक दिया है। इसकी वजह से अब वहां एक बड़ी झील बन गई है। झील में ज्यादा पानी जमा हुआ तो उसके फटने की आशंका है। 

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वैज्ञानिकों ने चेताया था कि जम्मू-कश्मीर काराकोरम रेंज समेत पूरे हिमालय क्षेत्र में ग्लेशियरों द्वारा नदी का प्रवाह रोकने पर कई झीलें बनी हैं। यह बेहद खतरनाक स्थिति है। दरअसल, 2013 की त्रासदी के बाद वैज्ञानिक लगातार हिमालय पर रिसर्च कर रहे हैं।

देहरादून के भू-विज्ञान संस्थान के शोधकर्ताओं ने एक बड़ी चेतावनी जारी की है। उनके मुताबिक ग्लेशियरों के कारण बनने वाली झीलें बड़े खतरे का कारण बन सकती हैं। 2013 की भीषण आपदा इसका जीता जागता उदाहरण है कि किस तरह से एक झील के फट जाने से उत्तराखंड में तबाही का तांडव हुआ था।

इस स्टडी में वैज्ञानिकों ने श्योक नदी के आसपास के हिमालयी क्षेत्र में 145 लेक आउटबर्स्ट की घटनाओं का पता लगाया है। इन सारी घटनाओं के रिकॉर्ड की एनालिसिस करने के बाद ये रिपोर्ट तैयार की है। रिसर्च में पता चला कि हिमालय क्षेत्र की करीब सभी घाटियों में स्थित ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, लेकिन पाक अधिकृत कश्मीर वाले काराकोरम क्षेत्र में ग्लेशियर में बर्फ की मात्रा बढ़ रही है. इसलिए ये ग्लेशियर जब बड़े होते हैं तो ये नदियों के प्रवाह को रोकते हैं।

इस प्रक्रिया में ग्लेशियर के ऊपरी हिस्से की बर्फ तेजी से निचले हिस्से की ओर आती है। डॉक्टर राकेश भाम्बरी ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियर की स्थिति की लगातार निगरानी जरूरी है। हम समय रहते चेतावनी का सिस्टम विकसित करना चाहते हैं। इससे आबादी वाले निचले इलाकों को संभावित नुकसान से बचाया जा सकता है।

 



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