फिर शाहदत, फिर अपमान... आखिर कब तक...?

सुरभि भावसार 

देश के दुश्मनों ने एक बार फिर गहरी चोट पहुंचाई है। भारत मां के सपूतों ने फिर अपने प्राणों का बलिदान दिया है। छत्तीसगढ़ के बीजापुर में नक्सलियों से हुई मुठभेड़ में हमारे 22 जवान शहीद हो गए हैं और करीब 31 जवान घायल बताए जा रहे हैं। इस ऑपरेशन में 15 नक्सलियों के मारे जाने की खबर है। कई जवान अभी भी लापता बताए जा रहे हैं। शहीद जवानों के शव गांव के ही करीब जंगलों में मिले है। बताया जा रहा है कि, नक्सली उनके हथियार, जूते और कपड़े तक ले गए। नक्सलियों ने सुरक्षाबलों पर रॉकेट लॉन्चर और एलएमजी से हमला किया था। 

भारत के वीर सपूतों की शाहदत पर एक बार फिर देश में गुस्सा होगा, सरकार से जवाब मांगा जाएगा, राजनीति होगी। शाहदत को नमन करने के लिए एक बार फिर लोग मोमबत्ती लेकर इकठ्ठा होंगे। 'भारत माता की जय', 'वीर जवान अमर रहे' जैसे नारे सुनाई देंगे। खैर शहीदों को श्रद्धांजलि देना, नारे लगाना गलत नहीं है, लेकिन कब तक हम ऐसे ही मोमबत्तियां जलाकर नारे लगाते रहेंगे? कब तक दुश्मन हमारे ही घर में घुसकर हमें चोट पहुंचाते रहेंगे? कब तक हम सरकार से जवाब मांगते रहेंगे? कब तक बदला लेने के लिए शोर मचाते रहेंगे?

कोई आतंकी हमला हो या नक्सलियों से मुठभेड़, जब देश का एक भी जाबांज शहीद होता है तो बहुत दुख होता है। जब देश में ऐसी कुछ अप्रिय घटना होती है तो सैकड़ों की भीड़ मन में गुस्सा और आंखों में आंसूं लिए  इकठ्ठा हो जाती है और सरकार से जवाब मांगती है, लेकिन ये गुस्सा और आक्रोश उस समय क्यों नहीं दिखता है, जब कोई देश के खिलाफ बोलता है? क्यों एक भी आवाज नहीं आती, जब सेना से सबूत मांगे जाते है? क्यों शोर नहीं होता, जब कोई कहता है कि, कश्मीर में तिरंगा नहीं लहरा सकता? क्यों सन्नाटा पसर जाता है, जब कोई जनता के बीच में खड़े होकर चीन और पाकिस्तान के गुण गाता' है?

ये तमाम सवाल आज इसलिए, क्योकि सरकार के किसी भी फैसले का विरोध करने और अपनी मांगे मनवाने के लिए, तो बड़े-बड़े आंदोलन होने लगते है। अपने वोटबैंक के लिए कई नेता समर्थन में खड़े हो जाते है लेकिन जब बात देश की आती है, तब ये मौन क्यों? वोटबैंक के लिए तो नेता बहुत शोर मचाते है। जब देश पर इस तरह का कोई हमला होता है तो गुस्सा उन्हें भी आता होगा, दुख उन्हें भी होता होगा, जो दिल्ली से सिंहासन पर बैठे हैं लेकिन शर्म आती है, जब वाही लोग सेना से सबूत मांगते है, जो वोटबैंक के लिए मंच से चिल्ला-चिल्लाकर सरकार से बदला लेने कि मांग करते हैं। 

ऐसे ही किसी की हिम्मत नहीं हो जाती हमारे ही घर में घुसकर हमपर ही हमला करने की। उसके पीछे भी अपनों की ही गुटबाजी होती है। यहां ये कहना गलत नहीं होगा कि, आज जो ये हमले हो रहे है उसके जिम्मेदार हम ही है। जब तक घर में आस्तीन के सांप पाले हुए है, जब तक हमारे ही घर के कुछ लोग इन्हें पालते रहेंगे, ऐसी घटनाएं होती रहेंगी। यदि इन घटनाओं को रोकना है, तो सेना पर सवाल उठाने, सरकार से जवाब मांगने और नारेबाजी करने से कुछ नहीं होगा। इसके लिए हमें अपने ही घर के कचरे को साफ़ करना होगा। वोटबैंक की राजनीति छोड़कर देश के लिए एकजुट होना होगा, तभी हम देश को सुरक्षित रख पाएंगे। 











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