दिखने में तो वो भी इंसान थे
सुरभि भावसार
दिखने में तो वो भी इंसान थे जिन्होंने मुझे पटाखों से भरा अनानास खिलाया। दिखने में तो वो भी इंसान थे जिन्हें मैंने इंसान समझा। दिखने में तो वो भी इंसान थे जिन्हें मैंने इंसान समझ उनपर भरोसा किया लेकिन अफ़सोस, वो केवल दिखने में ही इंसान थे, उनके अंदर इंसानियत नहीं थी। मैं भूल गई थी कि ये मनुष्य इतना क्रूर हो गया है कि अपने स्वार्थ के लिए कुछ भी कर सकता है।
ये कहानी है उस हथिनी कि जिसे भूख से तड़पता देख कुछ लोगों ने पटाखों से भरा अनानास खिला दिया। ये मामला केरल जैसे शिक्षित राज्य से सामने आया है। दरअसल, मल्लपुरम की सड़कों पर एक गर्भवती हथिनी खाने की तलाश में निकलती है। उसे भूखा देख कुछ लोग उसे अनानास देते है और वो उनपर भरोसा कर उसे खा लेती है। वो जानती भी नहीं होगी कि उसे इस अनानास की क्या कीमत चुकानी पड़ेगी।
जो अनानास हथिनी को दिया गया था, वो पटाखों से भरा था। उसे खाने के बाद पटाखे उसके मुंह में फट जाते है। उसका मुंह और जीभ बुरी तरह जख्मी हो जाती है। जख्मों के कारण वह कुछ खा-पी नहीं पाती। गर्भ के दौरान भूख भी ज्यादा लगती और उसे अपने बच्चे का भी ध्यान रखना होता है। घायल अवस्था में भूख से तड़पती हुई हथिनी सड़कों पर भटकती रही लेकिन उसने किसी भी इंसान को नुकसान नहीं पहुंचाया। जख्मों को ठंडा करने और उसे मक्खी-कीड़ों से बचाने के लिए पानी खोजते हुए नदी तक पहुंचती है और मुंह को पानी से सटाकर खड़ी हो जाती है।
जब वन विभाग को घटना के बारे में पता चलता है तो वे मौके पर पहुंचकर हथिनी को पानी से बाहर निकालने की कोशिश करते है लेकिन हथिनी को शायद समझ आ गया था कि उसका अंत निकट है और कुछ घंटों बाद नदी में खड़े-खड़े ही वह दम तोड़ देती है।
वन विभाग के ऑफिसर ने जब इस घटना से दुखी और बैचेन होकर इसे फेसबुक पर लिखा तो यही सवाल उठा कि मनुष्य इतना क्रूर हो गया है। वह भोलीभाली हथिनी शायद जानती नहीं होगी कि ये अनानास उसे इंसान की शक्ल में छिपे शैतान ने दिया है। उसने उस इंसान पर भरोसा किया जो शायद इंसान था ही नहीं। क्या इंसान अपनी मनुष्यता पूरी तरह भूल चुका है?
यहां पढ़ाई और नैतिकता में बहुत बड़ा अंतर है। जब तक पढ़ाई के साथ नैतिकता नहीं सिखाई जाएगी और जब तक आप नैतिक मूल्य नहीं सीखेंगे तब तक आपका पढ़ा-लिखा होना किसी काम का नहीं होगा। ऐसे डिग्रीधारियों से वे अनपढ़ आदिवासी बहुत अच्छे है जो जंगलों को बचाने के लिए अपनी जान लगा देते हैं, जंगलों से प्रेम करना जानते हैं, जानवरों से प्रेम करना जानते हैं।
तुम अपने मनोरंजन के लिए इन बेजुबान और भोलेभाले जानवरों के साथ क्रूरता कर रहे हो। कभी गायों को मार दिया जाता है, कभी कुत्ते के मुंह में पटाखे रख दिए जाते है तो कभी गर्भवती हाथी के। ये बात ज्यादा पुरानी नहीं है जब ऑस्ट्रेलिया में हजारों ऊंटों को केवल इसलिए मार दिया जाता है क्योकि वे पानी ज्यादा पीते है।
जितना हक़ धरती पर भगवान ने हम इंसानों को दिया है उतने ही जानवरों को भी। उनके जंगलों में तो हमने बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियां और मकान बना लिए, तब उन्होंने हमे कोई नुकसान नहीं पहुंचाया लेकिन आज हम इतने स्वार्थी हो गए है कि जब वे हमारे क्षेत्र में आते है तो हम उनके साथ इस तरह की क्रूरता करते है। हमारे मनोरंजन के लिए उनकी जान लेने से भी पीछे नहीं हटते।
ये मत भूलना इन बेजुबान जानवरों की मां प्रकृति होती है। जिस दिन इस मां ने अपने बेजुबान बच्चों पर हो रहे अत्याचार का बदला लेने के लिए रौद्र रूप दिखाया तो ये पृथ्वी बहुत बड़ी आपदान झेलेगी और इंसान एक झटके में ख़त्म हो जाएगा। उस समय ये बेजुबान जानवर खुश होंगे, प्रकृति झूमेगी और इंसान सिर्फ त्राहिमाम करेगा। आज दुनिया में फैली कोरोना महामारी भी इसी का उदाहरण है कि मनुष्य ने प्रकृति के दोहन में हर सीमा लांघ दी है और आधुनिक पढ़ाई करने वाला इसकी दवा तक नहीं खोज पा रहा।

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